पंचांग तत्व
तिथि, योग एवं करण
पंचांग के पाँच अंग — तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार — मिलकर दिन की ऊर्जा का पूरा चित्र बनाते हैं। कोई भी शुभ कार्य शुरू करने से पहले पंचांग देखना हमारी परम्परा में इसीलिए अनिवार्य माना गया है — सही समय पर किया गया काम आधी मेहनत में दोगुना फल देता है।
तिथि (चन्द्र दिन)
वैदिक कैलेंडर की 30 चन्द्र तिथियाँ
तिथि सूर्य और चन्द्रमा के बीच के कोणीय अन्तर से बनती है — जब यह अन्तर 12 अंश बढ़ता है, एक नई तिथि शुरू होती है। शुक्ल पक्ष की 15 और कृष्ण पक्ष की 15 — कुल 30 तिथियाँ एक चन्द्र मास बनाती हैं। हमारे पूर्वज जानते थे कि हर तिथि की ऊर्जा अलग होती है — इसीलिए विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार — सब के लिए तिथि देखी जाती थी।
योग (पंचांग योग)
वैदिक पंचांग के 27 योग
पंचांग का योग ग्रह-योग से अलग है — यहाँ सूर्य और चन्द्रमा के देशांतर का योग करके उसे 27 भागों में बाँटा जाता है। हर भाग एक योग है — विष्कुम्भ से लेकर वैधृति तक। कुछ योग अत्यन्त शुभ हैं, कुछ वर्जित। जो पंचांग जानता है, वह समय की इस सूक्ष्म भाषा को पढ़ सकता है।
करण (अर्ध-तिथि)
वैदिक कैलेंडर के 11 करण
तिथि का आधा भाग करण है — लगभग 6 घंटे का। 11 करण होते हैं जिनमें 4 स्थिर हैं और 7 आवर्ती। यह पंचांग का सबसे सूक्ष्म अंग है जो किसी कार्य के लिए दिन के भीतर सबसे उचित घड़ी बताता है। जब तिथि और नक्षत्र शुभ हों पर करण न देखा जाए — तो शुभता अधूरी रह जाती है।